सरगुजा में रियासतकालीन परंपरा आज भी दैवीय आस्था के रूप में बरकरार है जहां भक्ति की अलौकिक मिसाल तरह तरह से देवालयों से जुड़ी हुई है। कुछ ऐसी ही आस्था सूरजपुर जिले के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल कुदरगढ़ में देखने को मिलती है। मंदिर की खासबात यह है कि मन्नत पूरी होने पर यहां बकरे की बलि दी जाती है। बकरे के रक्त को कुंड में चढ़ाया जाता है। सैकड़ों बलि के बावजूद कुंड से रक्त बाहर नहीं आता।
मंदिर की पृष्ठभूमि छत्तीसगढ़ में कुदरगढ़ देवी मां बागेश्वरी के श्रद्धेय मंदिर के लिए जाना जाता है। यह मंदिर भगवती माँ दुर्गा को समर्पित है। मंदिर तक पहुँचने के लिए भक्त पहाड़ी की चोटी पर 9 सौ सीढ़ी की सीधी चढ़ाई करते हैं। ओड़गी ब्लॉक मुख्यालय से 6 किमी दूर मंदिर घने वन से घिरा हुआ है। मां कुदरगढ़ी के दर्शन के लिए प्रदेश भर से भक्त पहुंचते हैं। वनों की हरियाली, कलकल करता झरना, बंदरों की उछल कूद लोगों को भाती है।
मंदिर में प्रवेश के लिए पहाड़ी के दोनों ओर सीढ़ी है। एक ओर 900 सीढ़ी सीधी चढ़ाई वाली है। वहीं दूसरी ओर हजार सीढ़ी से चढ़ना थोड़ा आसान है। मंदिर को लेकर मान्यता है कि 17वीं शताब्दी के दौरान बालंद राजा कोरिया के वास्तविक शासक थे। स्थानीय पौराणिक कथाओं के अनुसार मंदिर स्थल के पास जबरदस्त शक्तियां थी और वह अपने सभी विश्वासियों की सभी इच्छाओं को पूरा करती थीं। इच्छा पूरी होने पर राजा यहां बकरे के रक्त का बलिदान चढ़ाते थे। बकरे के खून को एक 6 इंच के कुंड में डाल दिया जाता था। आज भी सैकड़ों बकरों के खून से भरे होने के बावजूद इस कुंड से कभी भी खून बाहर नहीं बहता है। यह आज भी दैवीय चमत्कार माना जाता है।
खूबसूरत पहाड़ों और घने वनों से घिरा है मंदिर
सूरजपुर से कुदरगढ़ मंदिर की यात्रा खूबसूरत पहाड़ों और घने वनों से भरी है। पहाड़ी पर चढ़ाई के रास्ते में स्नान के लिए कुंड और झरना बना हुआ है। कुदरगढ़ मंदिर पहुंचने के बाद आप उस शांतिपूर्ण और धार्मिक वातावरण को अनुभव करने के लिए तैयार हो जाएंगे जो यहां का आभूषण है। मंदिर के पास एक छोटा मार्केट है जहां आप विभिन्न प्रकार के धार्मिक आभूषण, पूजा सामग्री और स्थानीय शिल्प उत्पाद खरीद सकते हैं।
हर साल करीब 30 लाख रुपए का चढ़ावा
माँ बागेश्वरी देवी लोक न्यास ट्रस्ट कुदरगढ़ के भुवन भास्कर सिंह के अनुसार मंदिर में हर साल करीब 30 लाख रुपए का चढ़ावा आता है। इसमें चार-पांच किलो चांदी के जेवरात व पांच तोले के आभूषण चढ़ावे में आते हैं। कोरोना काल के दौरान भी मंदिर में साढ़े सात लाख रुपए का चढ़ावा आया। ट्रस्ट के खाते में करीब 70 लाख से अधिक रुपए जमा है। चैत्र नवरात्र में लगने वाले मेले में जिला प्रशासन, जनप्रतिनिधि सहयोग करते हैं।
अष्ट भुजी महिसासुर मर्दनी का स्वरुप दिखता है
कुदरगढ़ देवी के मंदिर की मूर्ति लाल पत्थर की अष्ट भुजी महिसासुर मर्दनी स्वरुप है। बताया जाता है कि यह मूर्ति 18वीं सदी में हडौतिया चौहान वंशो के अधिपत्य में आई थी। ग्रामीण बताते हैं कि बालंद क्रूर व अत्याचारी राजा था जो सीधी क्षेत्र में अपने 200 साथियों के साथ लूट पाट व डकैती करता था। राजा तमोर पहाड़ पर रहता था।
सूरजपुर से 44 किमी है मंदिर की दूरी
कुदरगढ़ मंदिर दर्शन के लिए आपको सबसे पहले सूरजपुर पहुंचना होगा। यहां से कुदरगढ़ मंदिर की दूरी 44 किमी है। सूरजपुर नगर से कुदरगढ़ मंदिर तक पहुंचने के लिए आप निजी वाहन का इस्तेमाल कर सकते हैं या मंदिर तक टैक्सी या प्राइवेट कार किराए पर उपलब्ध हैं। कुदरगढ़ के लिए बस स्टैंड से यात्री बसें भी चलती हैं। सूरजपुर तक ट्रेन सुविधा भी उपलब्ध है। अम्बिकापुर से मंदिर की दूरी 77 किमी है।
फोटो/वीडियो : प्रकाश देबनाथ







