छत्तीसगढ़ के बैकुंठपुर में बांध बनाने के लिए पहाड़ी पर डायनामाइट से कई विस्फोट किया गया पर एक पत्थर तक नहीं टूटा। तीन से चार दिन के प्रयास के बाद भी जब कंपनी सफल नहीं हुई तब उत्तरप्रदेश से पंडित बुलाए गए। जहां धार्मिक अनुष्ठान के दौरान अचानक जमीन से धुंआ उठने लगा। यह नजारा देखकर सभी हैरान हो गए। फिर पंडित द्वारा यह जानकारी दी गई कि यह कोरिया रियासत की आराध्य देवी माँ रमदईया हैं।
बताते चलें कि कोरिया जिले के सागरपुर गांव में माँ रमदईया देवी का धाम है। मान्यता है कि पहाड़ी की गुफा से माँ का स्वरूप प्रकट हुआ था। जिला मुख्यालय से मंदिर की दूरी करीब 3 किमी है। यहां रियासतकाल से ही राजा पूजा करने पहुंचते थे और आज भी हर साल हजारों की संख्या में भक्त पहुंचते हैं। जैसे-जैसे नवरात्र की तिथि बढ़ती है, वैसे-वैसे मंदिर में भक्तों की भीड़ बढ़ती जाती है।
मंदिर समिति के अनुसार 29 साल पहले झुमका जलाशय बनाने के लिए पहाड़ी पर कई विस्फोट किये गए थे पर एक पत्थर तक नहीं टूटा। बांध निर्माण में लगे कुछ इंजीनियरों की मृत्यु तक हो गई। अनहोनी को देखकर उत्तप्रदेश से पंडित बुलाए गए जिनके परामर्श पर यहां मंदिर का निर्माण हुआ। मान्यता है कि धाम पर भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती है। धाम को विश्वस्त स्थान माना जाता है।
मंदिर को लेकर एक कहानी यह भी है कि गांव का बैगा यहां बकरे काटता था। एक दिन बकरे काटने के बाद वह औजार भूल कर घर जा रहा था। तभी रास्ते में ध्यान आया तो वह वापस लौटा पर वहां का नजारा देख हैरान हो गया क्योंकि उस स्थल पर खून का एक धब्बा तक नहीं था। लोग ऐसा बताते हैं कि देवी ने उसे दर्शन दिया। फिर बैगा ने पहाड़ी के स्थल पर देवी का वाश होने की जानकारी ग्रामीणों को दी। जिसके बाद पूरा गांव उस स्थान पर एकत्र हो गया और सबने देवी माँ की पूजा अर्चना शुरू कर दी। बाद में यहां माँ का मंदिर बना। तब से लेकर आज तक यहां प्रत्येक चैत्र व कार्तिक नवरात्र में ज्वारा बोकर ज्योत प्रज्जवलित की जाती है।


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