कौवे की बीट से तैयार होते हैं बरगद और पीपल के पौधे, आंनदपुर में तैयार हुई नर्सरी

श्राद्ध के दिनों में कौओं को भोजन देने की परंपरा शुरूआत क्यों हुई ? जानें प्रकृति से क्या है जुड़ाव 

त्तीसगढ़ के कोरिया जिले में पहली बार आनंदपुर नर्सरी में कौवे की बीट से 80 हजार बरगद और पीपल के पौधे तैयार किये गए हैं। इससे पहले सरगुजा संभाग में अब तक बरगद और पीपल के पौधों की नर्सरी तैयार नहीं की जाती थी। कोरिया वन मंडल कौओं के बीट से बीज तैयार कर रहा है। इससे भविष्य में पेड़ों की संख्या व पर्यावरण में ऑक्सीजन का स्तर बेहतर होगा। 

पीपल और वट वृक्ष औषधि के लिए उपयोगी है। एक पुराना पेड़ रोज 250 लीटर ऑक्सीजन देता है। इसलिए इन्हें बचाने के लिए ऋषि-मुनियों ने श्राद्ध के दिनों में कौओं को भोजन देने की परंपरा शुरू की थी। क्योंकि इनके पौधों को उगाना है तो बिना कौवे की मदद से संभव नहीं है। मादा कौआ भादो महीने में अंडा देती है। काक बच्चों को भी पौष्टिक और भरपूर आहार मिलना जरूरी है, इसलिए प्राचीन काल से ही ऋषि-मुनियों ने कौवों के नवजात बच्चों के लिए हर आंगन या छत में पौष्टिक आहार की व्यवस्था की ताकि कौवों के नए वंश का पालन पोषण ठीक हो। यह प्रक्रिया प्रकृति रक्षण के लिए भी जरूरी है। 

देववृक्ष कौआ पक्षी प्रदत्त है : बरगद और पीपल के वृक्षों को यदि संरक्षित करना है तो कौओं को बचाना होगा। क्योंकि कौवे की बीट से इसके पौधे तैयार होते हैं। देववृक्ष वट और पीपल कौआ पक्षी प्रदत्त माना जाता है। इन दोनों वृक्षों के फल कौवे खाते हैं। कौवे जहां-जहां बीट करते हैं, वहां-वहां इसके पौधे उगते हैं।

                                    

वट और पीपल का पेड़ चाहिए तो कौओं को बचाना होगा : एसडीओ  

कोरिया वन मंडल के एसडीओ श्री अखिलेश मिश्रा ने बताया कि नर्सरी में विलुप्त हो रहे बरगद, पीपल के पेड़ों को संरक्षित करने पौधे तैयार किये जा रहे हैं। सरगुजा में पहली बार 40-40 हजार बरगद, पीपल की नर्सरी तैयारी की गई है। इसके रोपण से पर्यावरण में ऑक्सीजन का स्तर बढ़ेगा। इस साल नर्सरी से करीब 16 लाख पौधे जिले के रेंज में भेजे गए हैं। 

पक्षियों के बीट से बीज एकत्र करते हैं : रोपणी प्रभारी 

आनंदपुर नर्सरी के प्रभारी श्री रामकुमार तिवारी ने बताया कि बरगद और पीपल के पौधों की मांग भी आती रही है। पीपल और बरगद दोनों के पौधे बीज से पल्लवित नहीं होते हैं। बल्कि ये पक्षियों के बीट से निकलते हैं। पक्षियों के बीट से बीज एकत्र कर पौधे तैयार कर रहे हैं।  दोनों वृक्ष के फल कौवे खाते हैं और उनके पेट में ही बीज उगने लायक होते हैं। 


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